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घर-घर उपनिषद – सर्वसार उपनिषद भाष्य | आचार्य प्रशांत | सम्पूर्ण पुस्तक सारांश Download PDF

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Ghar Ghar Upanishad – Sarvasar Upanishad Bhashya Book Summary


आचार्य प्रशांत, एक प्रखर वैदिक विचारक और सत्य के खोजी, अपनी पुस्तक “घर-घर उपनिषद – सर्वसार उपनिषद भाष्य” में उपनिषदों के सार को घर-घर पहुँचाने का प्रयास करते हैं।
यह पुस्तक केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन के गहरे प्रश्नों का समाधान है — मैं कौन हूँ? जीवन का उद्देश्य क्या है? सच्चा सुख कहाँ है?

उपनिषद वेदों का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण भाग है, जिसे “ज्ञानकांड” भी कहा जाता है। आचार्य प्रशांत का यह कार्य आधुनिक मनुष्य के लिए प्राचीन वेदांत का सरल और प्रभावी भाष्य है।


वेद से उपनिषद तक की यात्रा

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि वेद किसी एक व्यक्ति या समय की रचना नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की ज्ञान परंपरा का परिणाम हैं।
वेदों में शुरुआत मंत्र भाग से होती है — देवताओं का पूजन, आशीर्वाद की प्रार्थना, भौतिक सुख की आकांक्षा।
इसके बाद ब्राह्मण, आरण्यक और अंततः उपनिषद आते हैं, जहाँ ध्यान पूर्णतः बाहरी प्रकृति से हटकर आंतरिक सत्य की ओर चला जाता है।

“सत्य तो प्रकृति से परे है” – यही उपनिषदों का मूल स्वर है।


उपनिषदों का महत्व

  • उपनिषद भारत की आत्मा हैं।
  • महात्मा बुद्ध से लेकर स्वामी विवेकानंद तक, सभी महापुरुषों ने इनके प्रभाव को स्वीकार किया।
  • पाश्चात्य दार्शनिक शोपेनहावर ने इन्हें “मानव बुद्धि की सर्वोच्च रचना” कहा।
  • राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, रमण महर्षि जैसे सुधारकों ने इन्हें आध्यात्मिक जागरण का स्रोत माना।

पुस्तक के प्रमुख विषय

1. बंधन और मोक्ष की परिभाषा

आचार्य प्रशांत बताते हैं:

“आत्मा ही ईश्वर और जीव रूप है, पर जब वह शरीर के साथ अहंकार जोड़ लेता है तो बंधन है।
इस अहंकार से मुक्ति ही मोक्ष है।”

अज्ञान (अविद्या) बंधन का कारण है, और ज्ञान (विद्या) मोक्ष का साधन।


2. जीवन की चार अवस्थाएँ

  1. जाग्रत – इंद्रियों द्वारा बाहरी संसार का अनुभव।
  2. स्वप्न – इंद्रिय-विषयों का मानसिक अनुभव।
  3. सुषुप्ति – गहन निद्रा, जहाँ न विषय है, न जागरूकता।
  4. तुरीय – पूर्ण शुद्ध चेतना, जो इन तीनों से परे है।

3. पंचकोश – आत्मा के आवरण

  • अन्नमय कोश – भोजन से बना स्थूल शरीर
  • प्राणमय कोश – प्राण ऊर्जा
  • मनोमय कोश – मन और भावनाएँ
  • विज्ञानमय कोश – बुद्धि और विचार
  • आनंदमय कोश – आनंद का आवरण

आत्मा इन सभी से परे है।


4. महावाक्य – उपनिषदों का हृदय

आचार्य प्रशांत पुस्तक में अनेक महावाक्यों की व्याख्या करते हैं:

“अहं ब्रह्मास्मि”मैं ही ब्रह्म हूँ (बृहदारण्यक उपनिषद)
“तत्त्वमसि”तू ही वह है (छांदोग्य उपनिषद)
“अयमात्मा ब्रह्म”यह आत्मा ही ब्रह्म है (मांडूक्य उपनिषद)
“सर्वं खल्विदं ब्रह्म”यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है (छांदोग्य उपनिषद)


5. अज्ञान से ज्ञान की ओर

पुस्तक में एक गहन प्रार्थना का उल्लेख है:

“असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय।”
(मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।)


आचार्य प्रशांत का दृष्टिकोण

  • वे बताते हैं कि आज हिंदू समाज में वेद और उपनिषदों का ज्ञान गौण हो गया है और पौराणिक अंधविश्वास प्रमुख हो गए हैं।
  • “घर-घर उपनिषद” अभियान का उद्देश्य है कि हर घर में वेदांत का प्रकाश पहुँचे
  • आधुनिक समस्याओं – तनाव, भय, मोह – का स्थायी समाधान आत्मज्ञान में है।

जीवन में अनुप्रयोग

  1. आत्म-पहचान – “मैं कौन हूँ?” का उत्तर खोजें।
  2. अहंकार से मुक्ति – शरीर और मन को अपनी सच्ची पहचान न मानें।
  3. सत्य के साथ जीवन – हर परिस्थिति में सत्य का साथ दें।
  4. ध्यान और साधना – तुरीय अवस्था की ओर बढ़ें।

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निष्कर्ष

“घर-घर उपनिषद – सर्वसार उपनिषद भाष्य” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक क्रांति का आमंत्रण है। यह हमें याद दिलाती है कि सत्य हमारे भीतर है और उसे पहचानना ही जीवन का लक्ष्य है।

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