यह कोई कल्पना नहीं है।
यह किसी लेखक की बनाई हुई कहानी भी नहीं है।
यह मेरे गाँव की सच्चाई है — मेरी आँखों से देखी हुई, मेरे मन से महसूस की हुई।
मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे से ज़िले अम्बेडकर नगर से हूँ।
मेरे गाँव का नाम है रामपुर।
यहाँ ज़्यादातर लोग यादव हैं और ज़्यादातर परिवारों की ज़िंदगी दूध के धंधे के आसपास ही घूमती है।
भैंसें, चारा, गोबर, दूध और बाज़ार — यही इनकी पूरी दुनिया है।
आज मैं आपसे अपने गाँव के ही एक ऐसे व्यक्ति की कहानी साझा करना चाहता हूँ,
जो देखने में बिल्कुल “सामान्य” है,
लेकिन जिसकी ज़िंदगी भीतर से लगातार टूटती रहती है।
उनका नाम है अनिल यादव।
20 भैंसें और 9 लोगों की ज़िम्मेदारी
अनिल यादव के पास लगभग 20 भैंसें हैं।
उनके परिवार में कुल 9 लोग रहते हैं —
अनिल, उनके पिता, उनकी पत्नी, एक बेटा और छह बेटियाँ।
अनिल का बेटा विकलांग है।
गाँव में लोग बताते हैं कि जन्म के समय वह बिल्कुल ठीक था,
लेकिन कई बार के चाइल्ड वैक्सीनेशन के बाद धीरे-धीरे उसकी हालत बिगड़ती चली गई।
आज वह अपना कोई भी काम खुद नहीं कर पाता।
उसे उठाना, बैठाना, खिलाना, साफ़ करना —
सब कुछ किसी न किसी को करना पड़ता है।
एक तरफ़ ऐसा बेटा जो हमेशा निर्भर है,
और दूसरी तरफ़ छह बेटियाँ —
जिनकी शादी का बोझ भविष्य की तरह सिर पर लटका हुआ है।
दिन की शुरुआत सूरज से पहले
अनिल यादव के घर में दिन सूरज के उगने से पहले शुरू हो जाता है।
चाहे सर्दी की जमा देने वाली ठंड हो,
चाहे लू से भरी गर्मी,
या फिर मूसलाधार बारिश —
काम कभी नहीं रुकता।
सबसे पहले
चारा काटा जाता है,
फिर भैंसों को खिलाया जाता है,
फिर पानी पिलाया जाता है।
इसके बाद शुरू होता है दूध दुहने का काम।
लगभग 10 भैंसें एक साथ दूध देती हैं।
दूध निकालते ही अनिल अपनी पुरानी बाइक से निकल पड़ते हैं —
घर-घर और दुकानों पर दूध देने।
जो दूध बच जाता है,
उसे उनकी बेटियाँ रोज़ डेयरी पर जमा कर देती हैं।
पढ़ाई, जो बस नाम की रह गई
दूध के बाद घर में खाना बनता है।
सबसे छोटी बेटी स्कूल जाती है,
लेकिन सच यह है कि पढ़ाई में किसी का ज़्यादा मन नहीं है।
बाकी लोग भैंसों को चराने के लिए निकल जाते हैं।
शाम को भैंसें वापस आती हैं,
फिर पानी,
फिर दोबारा दूध।
इस बार अनिल के पिता दूध लेकर बाज़ार निकलते हैं।
कई बार वे रात 9 बजे के बाद ही घर लौटते हैं।
यही दिनचर्या है।
हर दिन।
हर मौसम में।
कोई मशीन नहीं।
कोई आधुनिक सुविधा नहीं।
सब कुछ हाथों से।
खेती और थकान की दूसरी कहानी
दूध के साथ-साथ खेती भी चलती है।
बरसात में धान की रोपाई,
सर्दियों में धान की कटाई और पिटाई,
गर्मियों में गेहूँ की कटाई।
काम इतना है कि
थकने का समय ही नहीं मिलता।
लोग बाहर से देखकर कहते हैं —
“अनिल यादव अच्छा पैसा कमाते हैं।”
शायद यह सच भी हो।
लेकिन उस पैसे में
मुझे कभी सुख दिखाई नहीं दिया।
कमाई है, पर जीवन नहीं
अनिल यादव जितना भी पैसा कमाते हैं,
वह संघर्ष से निकला हुआ पैसा है।
वह पैसा न तो
उनकी ज़िंदगी आसान करता है,
न ही बच्चों का भविष्य सुरक्षित।
उनकी बेटियाँ 10वीं के बाद पढ़ नहीं पाईं।
अगर किसी ने पढ़ाई की भी है,
तो बस distance से, नाम भर की।
अब जो भी पैसा कमाया जा रहा है,
वह जाएगा —
बेटियों की शादियों में।
हमारे इलाके में एक “साधारण” शादी में ही
7–8 लाख रुपये खर्च हो जाते हैं,
और इसमें दहेज भी शामिल हैं।
यानी
पूरी ज़िंदगी की मेहनत
शादी के एक-दो दिन में खत्म।
शादी के बाद भी संघर्ष
दुर्भाग्य यह है कि
शादी के बाद बेटियों की ज़िंदगी भी आसान नहीं होती।
कम खर्च में शादी करने के लिए
अक्सर ऐसे लड़कों से विवाह होता है
जो खुद अपना खर्च नहीं उठा पाते।
इसका मतलब साफ़ है —
लड़कियों की ज़िंदगी भी
संघर्ष से भरी हुई।
संघर्ष की पीढ़ियाँ
अनिल यादव का जीवन संघर्ष है।
उनके बच्चों का जीवन और भी ज़्यादा संघर्ष से भरा होगा।
क्योंकि
न अच्छी पढ़ाई है,
न कोई skill,
न कोई सपना।
सबकी शादियाँ होंगी,
सबके बच्चे होंगे,
और वही कहानी
छह जगह फिर से दोहराई जाएगी।
यह संघर्ष सिर्फ़ एक घर में नहीं रुकेगा —
यह आगे बढ़ेगा।
ये गर्व से कहते हैं की वंश आगे बढ़ा रहे हैं लेकिन ये सच में सिर्फ गरीबी आगे बढ़ा रहे हैं।
सपनों से खाली ज़िंदगी
भैंसें, गोबर और दूध —
इसके अलावा उन्होंने कभी कुछ देखा ही नहीं।
“कभी बाहर घूमना है”
“कुछ अलग करना है”
“अपना passion follow करना है”
ऐसे सवाल
उनकी ज़िंदगी में कभी पैदा ही नहीं हुए।
आराम का सबसे आसान तरीका है —
मोबाइल पर reels scroll करना।
यह सिर्फ़ अनिल यादव की कहानी नहीं है।
यह एक आम भारतीय आदमी की कहानी है।
इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?
1. अज्ञान सबसे बड़ा बोझ है
अगर सही शिक्षा और जागरूकता होती,
तो शायद 7 बच्चों की जगह
1 या 2 बच्चे ही होते।
2. अंधी मान्यताएँ जीवन को बाँध देती हैं
“सब ऐसा करते हैं” —
यही सोच सबसे बड़ा जाल है।
3. Education सिर्फ नौकरी नहीं, सोच बदलती है
पढ़ाई इंसान को
सही निर्णय लेना सिखाती है।
4. गरीबी से ज़्यादा खतरनाक है सपनों की मौत
जब सपने ही नहीं होते,
तो इंसान जीता नहीं —
बस चलता रहता है।
5. संघर्ष की cycle तब तक चलती है, जब तक awareness नहीं आती
मुझे अनिल यादव और उनके परिवार को देखकर
बहुत दया आती है।
इसीलिए मैंने यह कहानी लिखी है —
ताकि
किसी और अनिल की कहानी ऐसी न बने।
यह कहानी वास्तविक है तो इसलिए गांव और व्यक्ति का नाम बदल दिया है।
अब सवाल आपसे है —
👉 आपने इस कहानी से क्या सीखा?
👉 क्या इस संघर्ष की cycle को तोड़ा जा सकता है?
कमेंट में ज़रूर बताइए।




