🌿 कविता – बुल्ले शाह
कोई रंग काला, कोई पीला,
कोई लाल गुलाबी करदा।
बुल्ले शाह मुरशिद वाला,
किसे किसे नूं चढ़दा।
कोई सजदा करे मस्जिद अंदर,
कोई मंदिर जाके सर धरे।
कोई गंगा विच डुबकी लावे,
कोई तीर्थां वाल धरे।
बुल्ले शाह मुरशिद वाला,
किसे किसे नूं चढ़दा।
कोई माला फेरत जपदा,
कोई तस्बीह हाथ विच धरदा।
कोई वेद कुरान पढ़दा,
कोई फ़िक़्ह फतवा करदा।
बुल्ले शाह मुरशिद वाला,
किसे किसे नूं चढ़दा।
कोई रोज़ा रखे रमज़ानां,
कोई व्रत उपवास करदा।
कोई योगी बन बन फिरदा,
कोई जोग कमाई धरदा।
बुल्ले शाह मुरशिद वाला,
किसे किसे नूं चढ़दा।
कोई काला कपड़ा पावे,
कोई भगवा रंग चढ़दा।
कोई जटा बढ़ावे तन ते,
कोई शीश मुंडाई धरदा।
बुल्ले शाह मुरशिद वाला,
किसे किसे नूं चढ़दा।
कोई बाहर रंग दिखावे,
अंदर दिल काला रहंदा।
जिस दिल विच प्रेम दा वासा,
ओही असली रंग चढ़दा।
बुल्ले शाह आह आखे बंदे,
रंगां नाल ना रब मिलदा।
मुरशिद दे दर ते जो झुके,
ओही सच दा रंग चढ़दा।
🌿 कविता का भावार्थ
1️⃣ बाहरी रंग बनाम भीतरी रंग
लोग काला, पीला, लाल, भगवा—अलग-अलग रंग धारण करते हैं। पर बुल्ले शाह कहते हैं कि कपड़ों का रंग नहीं, दिल का रंग मायने रखता है।
2️⃣ धर्म और कर्मकांड
कोई मस्जिद में सजदा करता है, कोई मंदिर में माथा टेकता है, कोई गंगा स्नान करता है। पर यदि भीतर प्रेम नहीं है, तो ये सब बाहरी क्रियाएँ अधूरी हैं।
3️⃣ ज्ञान और ग्रंथ
कोई वेद पढ़ता है, कोई कुरान, कोई फ़तवे देता है। पर केवल किताबें पढ़ लेने से सत्य नहीं मिलता—सत्य अनुभव और प्रेम से मिलता है।
4️⃣ असली “रंग” क्या है?
बुल्ले शाह के अनुसार असली रंग वह है जो मुरशिद (सच्चे गुरु) के प्रेम से चढ़ता है।
जिस दिल में प्रेम बसता है, वही सच्चा रंग है।
5️⃣ आध्यात्मिक संदेश
- ईश्वर बाहरी दिखावे में नहीं, भीतर के प्रेम में है।
- धर्म का सार प्रेम और विनम्रता है।
- सच्चा मार्गदर्शक (मुरशिद) ही भीतर का अंधकार दूर करता है।
🌿 निष्कर्ष
यह काफ़ी हमें याद दिलाती है कि:
धर्म का असली रंग प्रेम है।
बाहरी पहचान नहीं, भीतर की सच्चाई मायने रखती है।
Thanks for Reading!💖
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